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Beyond
Times
Random Thoughts ...
This blog is about expressing and sharing thoughts which are not structured and can be termed as random. Randomness has its own charm and beauty which is often nostalgic and Beyond Times.


जामवंती अहसास
जानते हुए भी कि- गर्द चेहरे पर जमी है बार-बार आईना ही पोंछता हूँ | नज़रें अक्सर धुँधलाई रहती हैं मगर हर बार चश्मा ही बदलता हूँ | जीवन क्षणभंगुर है और शरीर भी नश्वर यह जानते हुए भी माया के बियावानों में मृगतृष्णा के पीछे क्यों भटकता हूँ ? ज़माने के शोर में ख़ुद को काट-छाँट कर उसके तंग चौखटे में समाने की अनमनी कोशिश क्यों करता हूँ ? सुना है - आत्मा अमर है तो फिर बेवजह उसे मारने का निरर्थक जतन ही क्यों करता हूँ ? मैं तो खुले आसमान का विस्तार हूँ कायनात में जो ना समाये

Manoj Mittal
Aug 272 min read


हवा ही शायद थम सी गई है
फिर आज़ादी की तारीख़ है बदन निचोड़ती उमस है झक खादी का लिबास है पलकों में बसे तिरंगी साये हैं सरज़मीन आज़ाद है पर हम ? बहुत लंबी और गहरी रात थी अँधेरा छटा और जब आँखें खुलीं तो नीले आसमान मे जैसे रोशनी का एक दरीचा खुला | उम्मीदों के सुर्ख़ाबी पंखों पर हमने अपना तिरंगा सजाया अरसे तक, सतरंगी सपनों सा वो आज़ाद फ़िज़ा में लहराया | भूख से ज़िंदगी दम तोड़ती क्यों है ? बूढ़ी बेवा कोने में सिसकती क्यों है ? बेटियों के सपने कुचले जाते क्यों हैं ? शंखनाद और अज़ान के बीच ये खामोशी

Manoj Mittal
Aug 132 min read


शायद तुम ही हो
हवा में यूँ सरसराहट हुई जो कहीं, तो न जाने क्यों लगा कि शायद तुम हो | वक़्त की चिलमन से उझकती ये रोशनी यकीनन तुम हो | हैरान था मन- भीगी रातों में बेइंतहा सोचा किया तुमको, पर ग़फ़लत में भूल गया बावरा कि मेरी हर साँस में तुम हो | शोर की सख़्त दीवारों से यूँ छनकर आहट आई तो लगा कि शायद तुम हो | उदास तन्हा लम्हे जानते हैं - कि ग़ज़ल के मिसरों में लाज़िमन तुम हो | ज़िन्दगी के झंझावातों में - स्नेहिल स्पर्श मिला तो लगा वो तुम हो | पशेमान हूँ – नज़रें कैसे अनदेखा कर गईं ; मेरे

Manoj Mittal
Jul 312 min read


जीवन- समय की अविरल धारा
जीवन- समय की अविरल धारा है नियति है- इसमें उसको बहते जाना है बिना थके..बिना रुके.. बस निरंतर चलते जाना है.. मंजिलों की खड़ी ऊँचाइयाँ डराएँगी बुलंदियों से झांकती गहराइयाँ भी- मन को घबराएँगी यादों के बियाबान अक्सर उलझाएँगे ख़ुद के साये भी साथ छोड़ जाएँगे ज़माने की राहें नित भरमाएँगी मन की दुर्बलताएँ भी भटकाएँगी.. सफ़र तो दुष्कर होगा ही- मन की गठरी जो भारी है मोह-माया का जंजाल बलशाली है अनिश्चितताओं की आशंकाएँ हैं क़दमों में भय की ज़ंजीरें हैं आलस्य भी भरा है अंग अं

Manoj Mittal
Jun 162 min read


ज़रूरी नहीं कि तुम याद करो
ज़रूरी नहीं कि तुम याद करो मुझे भुला भी कहाँ पाओगी बेशक लबों से ना बयान करो जज़्बातों को आँखों से- ना छुपा पाओगी फ़ासला कितना ही रखा करो अपनी खुशबू को हवाओं से - कैसे ही बचाओगी हवा मे ख़ामोश ख़ुमारी बहुत है अगर ना चाहो तो भी- बहक ही जाओगी टंगे हें जो हसीन लम्हे गुज़रे वक़्त की शाखों पर उन्हें क्या कभी- तोड़ पाओगी कल का बरसा सावन आज़ भी अटका है पेड़ों पर कर लो कोशिश कितनी - पर भीग ही जाओगी अक्स तुम्हारा देखा था एक अरसा पहले उसे तुम धुंधला भी - कहाँ कर पाओगी बिल्कुल ज़रूरी न

Manoj Mittal
May 292 min read


वो बात जो हमने कही नहीं..
जो बात कहनी थी वो कभी कही नहीं चुप्पी बन-मगर वो ठहर गई वक़्त की शाख़ पर अंतहीन रात सी.. दर्द के सुरों में-पगती रही ख़्यालों की धुंध में-झाँकती रही उम्रभर, अल्फ़ाज़ों में- आशियाना तलाशती रही वो कहीं खोई नहीं.. जो बात हमने कही नहीं तुमने भी वो सुनी नहीं पर वो कहीं गई नहीं चुप्पी के आशियाने में ठहरी है-वक़्त की शाख़ पर आज भी- अंतहीन रात सी.. वो बात जो हमने कही नहीं.. पगती- धीरे धीरे पकना /पिघलना मनोज मित्तल - 23 मई 2026 | नोएडा Proof check- Bharti Technical support- Tris

Manoj Mittal
May 221 min read


उम्र-भर लम्बा फ़ासला
तपते जेठ के अंधड़ में इस बार न जाने क्यों ग़ज़ब की ठंडक है- हो, न हो ये तेरी गली से होकर ही गुज़रा है| दिन की गुमसुम, लंबी राहें न जाने क्यों- आज फिर लौटा लाईं हैं मुझको साँझ की इस तन्हा दहलीज़ तक| तेरी एक झलक की शिद्दत-भरी तलब थी मुझे, किवाड़ की साँकल खटखटाने को- उठे हाथ अनायास ठिठके क्यों हैं? तुने मना किया था, उद्दाम मन मगर कहाँ माना- वक़्त के अंधेरों में झाँका, राख में चिंगारियाँ मिलीं और कुरेदा तो बस- झुलसे हुए सपने | बज़्म में जो ग़ज़ल सुनाई वो तेरी खामोशी के

Manoj Mittal
May 22 min read


एकाकी उद्वेलित और उद्विग्न मन
सुदूर सागर पार क्षितिज में डूबते सूरज की मद्धम लालिमा है मन के एकान्त में उग आये हैं बिसरी यादों के घने जंगल जंगल के घनेरे मे बुने घोंसलों की ओर परिंदों की लौटती थकी सी उड़ान है हर पल सूरज की किरणों पर हो सवार- क्षितिज पार जाने की उत्कट आकांछा है शाम ढले लेकिन लौटने की विवशता भी शने: शने: - कण-कण सा क्षय होता है हर अंश तिल तिल टूटता है हौसलों का मस्तूल धुले आकाश में घुला है हमख़्याली अक्स आँखों में सपनों की किरचें चुभी हैं विचारों के अनंत विस्तार में – संकुचित संसार क

Manoj Mittal
Apr 42 min read


सिमटती परछाइयाँ
पर्वत के पाषाणी सीने पर घिर आए हैं- उदासियों के घने साये, मेरी लंबी होती परछाईं से अनजान, अंतहीन डगर पर सुनसान कोना ढूँढती- ठहर गई है चुप्पी, मेरी अनकही बात-सी हवाओं के आवारा बवंडर में बिखर गई हैं- बेपरवाह तिरती रंग-बिरंगी चिंदियाँ, मेरी चाहतों की खोई मंजिल सी हवाई जहाज़ की खिड़की से झाँकते बादलों के उजले, रूई से नर्म फाहों में समाये हों - मेरे जज़्बातों के ठहरे सैलाब जैसे ईद की कल रात थी— अव्वल-ए-शब का चाँद, आज भी ठहरा है चाँदनी के उसी रुपहले ज़ीने पर मुद्दतों पहले

Manoj Mittal
Mar 222 min read


होली है
होली है- चटख धूप में बासंती हवा का साया है आसमान भी रंगबिरंगे सपनों सा रंगा है मदहोश पुरवाई में अबीर गुलाल घुला है सूनी आँखों में फागुनी ठंडाई का सुरूर है तलाशती हैं नज़रें- चेहरों पर सबके मगर रंगों का नक़ाब है | होली है – दूर तलक फैली सरसों की सुनहरी चादर है टेसू की पिचकारी के बिखरे दिलकश छींटे हैं ढोलक की थाप पर धड़कनों की थिरकन है रंगों से भीगते लजाते रिश्तों की नज़ाकत है मन के झरोखे में झाँकता जैसे कोई जीवन है | जलाई थी होली कल- कुछ बेवजह बुने ख़यालों की उजले मन पर

Manoj Mittal
Feb 282 min read


सफ़र की हैरानियाँ
ख़्वाहिशों की हसीन मंजिले- और सफ़र की हैरानियाँ ... मीनार की आड़ में- उदास मन का डूबता अनमना सूरज चाँदनी बन रातों में खिली धूप पुल की मेहराबों पर सोते परिंदे उनींदे पेड़ उचटती रातें- और ख्वाबों की तन्हाइयाँ ... आकाशगंगा से टूटता एक तारा मन्नत को तकती आँखें रात के सन्नाटे में- बसंत की दस्तक स्नेहिल आग़ोश में- पल्लवित होतीं नवकोंपलें भँवरों की गुनगुनाहट फाग की थाप- और ख्यालों की अल्हड़ पुरवाइयाँ ... फटती पों - फिसलता रात का घूँघट सूरज को फिर

Manoj Mittal
Feb 141 min read


यह ज़रूरी नहीं
सर्द, अफ़सुर्दा मौसम की भीगी दोपहर को रोशनी का दरीचा मिले ही- यह ज़रूरी नहीं। उदास रातों में आए मासूम ख़्वाबों को ज़मीं-ए-हक़ीक़त नसीब हो ही- यह ज़रूरी नहीं। लम्हों ने तराशा क़तरा-क़तरा वक़्त को हर लम्हे को सिला हासिल हो ही- यह ज़रूरी नहीं। उम्र-भर चला सहेजे यादों के जिन उजालों को मंज़िलों तक वो साथ निभाएँ ही- यह ज़रूरी नहीं। सपनीली ज़मीं पर रोपे ख़्वाहिशों के अंकुरों को माकूल आबोहवा मयस्सर हो ही- यह ज़रूरी नहीं। ख़ुद को खोजने में ख़ुद से किए सवालों को आसमानी जवाब मिलें ही

Manoj Mittal
Jan 252 min read


परिंदों की बेख़ौफ़ उड़ान
ज़ालिम कितना ही हो ज़माना, कितने ही क्यों न करे वो सितम— कहाँ रोक सकेगा वो -सरहदों पार परिंदों की बेख़ौफ़ उड़ान। आँधियाँ पूरी ताक़त से राहों पर धूल उड़ाएँगी, हौसलों के पंखों को लेकिन दीवारें कहाँ रोक पाएँगी। उजड़ेगी बगिया और गुलशन भी होंगे वीरान यहाँ, पछताएगा मगरूर माली- बहार कहीं और जो ठहर जाएगी। परिंदे बुन ही लेंगे सपनों के नए आशियाने प्रस्फुटित होंगी नव कोपलें और चमन होंगे गुलज़ार वहाँ | इतिहास गवाह है— दौर-ए-ज़ुल्म कभी ठहरता नहीं, उड़ान भर ले तू , परिंदे— थाम सके जो

Manoj Mittal
Dec 31, 20252 min read


तुम्हें ढूँढ ही लेता हूँ
कदमों की पदचापों से पहचान लेता हूँ साँसों के उच्छ्वास–निःश्वास से जान लेता हूँ आँखों की नमी से मन को भांप लेता हूँ मदहोश हवा में- ख़ुशबू तुम्हारी ढूँढ ही लेता हूँ | सर्दियों की शामें अक्सर सूनी होती हैं सर्द अँधेरों में समाने को विवश होती हैं सन्नाटों की चादर ओढ़ रातें भी सोती हैं सन्नाटों की दरारों में- तुम्हें मगर दूँढ़ ही लेता हूँ | फ़ासला मुझसे कितना ही चाहे रखा करो भुलाने का भी कितना ही जतन करा करो या दूर कितना ही क्यों न चली जाया करो यादों के झुरमुटों में- तुम्हें मगर

Manoj Mittal
Nov 20, 20252 min read


लौटूँगा जरूर..
दिगभ्रमित भटकाती राहें, तल्ख ज़माने की तपाती धूप, नाकामियों की सोई थकन, लंबी तन्हा रातों के वो रतजगे, रुपहले सपनों की खलिश , रूह की अनकही सी बेचैनी, हर लम्हा एक नई आज़माइश । झिलमिलाती ख्वाहिशों की तलब , जुस्तजू मे - सदियों का कारवां, रख्त-ए-सफर में यादों की पोटली, रुखसती में छलकती वो आँखें, तपते रेगिस्तान का असीम समंदर, गर्द-ए-गुमां का वो गुबार, तलाश में लौट आतीं सारी उम्मीदें, गेसूओं के साये की गहरी हसरतें , उद्वेलित मन... युगों की प्यास... ओह मृगतृष्णा ! झीने आँचल क

Manoj Mittal
Oct 18, 20252 min read


हवाओं जरा धीमें चलो
हवाओं जरा धीमें चलो पत्तों पर अटकी हैं शबनमी बूंदे सहमी हैं ...और बेचैन भी पलकों पे अटके आंसुओं की तरह कहीं ढलक ना जाएँ ... बाहुपाश में...

Manoj Mittal
Oct 4, 20252 min read


अपने अपने अँधेरे
अमावस्या की रात्रि का घनेरा कहीं झिलमिलाता आशा का कंदील दिव्य दीपक का दीप्तिमान आलोक- भटकी राह का पथ प्रदर्शक तिल तिल जल- पर स्वयं अँधेरे...

Manoj Mittal
Sep 5, 20252 min read


सुनो तो सही
सुनो तो सही ! हिमनदों के पिघलते सन्नाटे बेसब्र नदी के टूटते पाट दरकते पहाड़ों के रिसते घाव धँसती इमारतों के वजनी बोझ बरसातों में थमती...

Manoj Mittal
Aug 15, 20252 min read


Zamane ka Chasma
ज़माने का चश्मा The poem challenges the perception shaped by societal norms and expectations, urging readers not to view the world through...

Manoj Mittal
Jul 24, 20252 min read


Inescapable Reflections
जरूरी नहीं जरूरी नहीं कि तुम याद करो मुझे भुला भी कहाँ पाओगी | बेशक लबों से ना बयान करो जज़्बातों को आँखों से ना छुपा पाओगी | फासला...

Manoj Mittal
Jul 19, 20252 min read
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