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Beyond
Times
Random Thoughts ...
This blog is about expressing and sharing thoughts which are not structured and can be termed as random. Randomness has its own charm and beauty which is often nostalgic and Beyond Times.
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एकाकी उद्वेलित और उद्विग्न मन
सुदूर सागर पार क्षितिज में डूबते सूरज की मद्धम लालिमा है मन के एकान्त में उग आये हैं बिसरी यादों के घने जंगल जंगल के घनेरे मे बुने घोंसलों की ओर परिंदों की लौटती थकी सी उड़ान है हर पल सूरज की किरणों पर हो सवार- क्षितिज पार जाने की उत्कट आकांछा है शाम ढले लेकिन लौटने की विवशता भी शने: शने: - कण-कण सा क्षय होता है हर अंश तिल तिल टूटता है हौसलों का मस्तूल धुले आकाश में घुला है हमख़्याली अक्स आँखों में सपनों की किरचें चुभी हैं विचारों के अनंत विस्तार में – संकुचित संसार क

Manoj Mittal
Apr 42 min read


सिमटती परछाइयाँ
पर्वत के पाषाणी सीने पर घिर आए हैं- उदासियों के घने साये, मेरी लंबी होती परछाईं से अनजान, अंतहीन डगर पर सुनसान कोना ढूँढती- ठहर गई है चुप्पी, मेरी अनकही बात-सी हवाओं के आवारा बवंडर में बिखर गई हैं- बेपरवाह तिरती रंग-बिरंगी चिंदियाँ, मेरी चाहतों की खोई मंजिल सी हवाई जहाज़ की खिड़की से झाँकते बादलों के उजले, रूई से नर्म फाहों में समाये हों - मेरे जज़्बातों के ठहरे सैलाब जैसे ईद की कल रात थी— अव्वल-ए-शब का चाँद, आज भी ठहरा है चाँदनी के उसी रुपहले ज़ीने पर मुद्दतों पहले

Manoj Mittal
Mar 222 min read


होली है
होली है- चटख धूप में बासंती हवा का साया है आसमान भी रंगबिरंगे सपनों सा रंगा है मदहोश पुरवाई में अबीर गुलाल घुला है सूनी आँखों में फागुनी ठंडाई का सुरूर है तलाशती हैं नज़रें- चेहरों पर सबके मगर रंगों का नक़ाब है | होली है – दूर तलक फैली सरसों की सुनहरी चादर है टेसू की पिचकारी के बिखरे दिलकश छींटे हैं ढोलक की थाप पर धड़कनों की थिरकन है रंगों से भीगते लजाते रिश्तों की नज़ाकत है मन के झरोखे में झाँकता जैसे कोई जीवन है | जलाई थी होली कल- कुछ बेवजह बुने ख़यालों की उजले मन पर

Manoj Mittal
Feb 282 min read


सफ़र की हैरानियाँ
ख़्वाहिशों की हसीन मंजिले- और सफ़र की हैरानियाँ ... मीनार की आड़ में- उदास मन का डूबता अनमना सूरज चाँदनी बन रातों में खिली धूप पुल की मेहराबों पर सोते परिंदे उनींदे पेड़ उचटती रातें- और ख्वाबों की तन्हाइयाँ ... आकाशगंगा से टूटता एक तारा मन्नत को तकती आँखें रात के सन्नाटे में- बसंत की दस्तक स्नेहिल आग़ोश में- पल्लवित होतीं नवकोंपलें भँवरों की गुनगुनाहट फाग की थाप- और ख्यालों की अल्हड़ पुरवाइयाँ ... फटती पों - फिसलता रात का घूँघट सूरज को फिर

Manoj Mittal
Feb 141 min read


यह ज़रूरी नहीं
सर्द, अफ़सुर्दा मौसम की भीगी दोपहर को रोशनी का दरीचा मिले ही- यह ज़रूरी नहीं। उदास रातों में आए मासूम ख़्वाबों को ज़मीं-ए-हक़ीक़त नसीब हो ही- यह ज़रूरी नहीं। लम्हों ने तराशा क़तरा-क़तरा वक़्त को हर लम्हे को सिला हासिल हो ही- यह ज़रूरी नहीं। उम्र-भर चला सहेजे यादों के जिन उजालों को मंज़िलों तक वो साथ निभाएँ ही- यह ज़रूरी नहीं। सपनीली ज़मीं पर रोपे ख़्वाहिशों के अंकुरों को माकूल आबोहवा मयस्सर हो ही- यह ज़रूरी नहीं। ख़ुद को खोजने में ख़ुद से किए सवालों को आसमानी जवाब मिलें ही

Manoj Mittal
Jan 252 min read


परिंदों की बेख़ौफ़ उड़ान
ज़ालिम कितना ही हो ज़माना, कितने ही क्यों न करे वो सितम— कहाँ रोक सकेगा वो -सरहदों पार परिंदों की बेख़ौफ़ उड़ान। आँधियाँ पूरी ताक़त से राहों पर धूल उड़ाएँगी, हौसलों के पंखों को लेकिन दीवारें कहाँ रोक पाएँगी। उजड़ेगी बगिया और गुलशन भी होंगे वीरान यहाँ, पछताएगा मगरूर माली- बहार कहीं और जो ठहर जाएगी। परिंदे बुन ही लेंगे सपनों के नए आशियाने प्रस्फुटित होंगी नव कोपलें और चमन होंगे गुलज़ार वहाँ | इतिहास गवाह है— दौर-ए-ज़ुल्म कभी ठहरता नहीं, उड़ान भर ले तू , परिंदे— थाम सके जो

Manoj Mittal
Dec 31, 20252 min read


तुम्हें ढूँढ ही लेता हूँ
कदमों की पदचापों से पहचान लेता हूँ साँसों के उच्छ्वास–निःश्वास से जान लेता हूँ आँखों की नमी से मन को भांप लेता हूँ मदहोश हवा में- ख़ुशबू तुम्हारी ढूँढ ही लेता हूँ | सर्दियों की शामें अक्सर सूनी होती हैं सर्द अँधेरों में समाने को विवश होती हैं सन्नाटों की चादर ओढ़ रातें भी सोती हैं सन्नाटों की दरारों में- तुम्हें मगर दूँढ़ ही लेता हूँ | फ़ासला मुझसे कितना ही चाहे रखा करो भुलाने का भी कितना ही जतन करा करो या दूर कितना ही क्यों न चली जाया करो यादों के झुरमुटों में- तुम्हें मगर

Manoj Mittal
Nov 20, 20252 min read


लौटूँगा जरूर..
दिगभ्रमित भटकाती राहें, तल्ख ज़माने की तपाती धूप, नाकामियों की सोई थकन, लंबी तन्हा रातों के वो रतजगे, रुपहले सपनों की खलिश , रूह की अनकही सी बेचैनी, हर लम्हा एक नई आज़माइश । झिलमिलाती ख्वाहिशों की तलब , जुस्तजू मे - सदियों का कारवां, रख्त-ए-सफर में यादों की पोटली, रुखसती में छलकती वो आँखें, तपते रेगिस्तान का असीम समंदर, गर्द-ए-गुमां का वो गुबार, तलाश में लौट आतीं सारी उम्मीदें, गेसूओं के साये की गहरी हसरतें , उद्वेलित मन... युगों की प्यास... ओह मृगतृष्णा ! झीने आँचल क

Manoj Mittal
Oct 18, 20252 min read


हवाओं जरा धीमें चलो
हवाओं जरा धीमें चलो पत्तों पर अटकी हैं शबनमी बूंदे सहमी हैं ...और बेचैन भी पलकों पे अटके आंसुओं की तरह कहीं ढलक ना जाएँ ... बाहुपाश में...

Manoj Mittal
Oct 4, 20252 min read


अपने अपने अँधेरे
अमावस्या की रात्रि का घनेरा कहीं झिलमिलाता आशा का कंदील दिव्य दीपक का दीप्तिमान आलोक- भटकी राह का पथ प्रदर्शक तिल तिल जल- पर स्वयं अँधेरे...

Manoj Mittal
Sep 5, 20252 min read


सुनो तो सही
सुनो तो सही ! हिमनदों के पिघलते सन्नाटे बेसब्र नदी के टूटते पाट दरकते पहाड़ों के रिसते घाव धँसती इमारतों के वजनी बोझ बरसातों में थमती...

Manoj Mittal
Aug 15, 20252 min read


Zamane ka Chasma
ज़माने का चश्मा The poem challenges the perception shaped by societal norms and expectations, urging readers not to view the world through...

Manoj Mittal
Jul 24, 20252 min read


Inescapable Reflections
जरूरी नहीं जरूरी नहीं कि तुम याद करो मुझे भुला भी कहाँ पाओगी | बेशक लबों से ना बयान करो जज़्बातों को आँखों से ना छुपा पाओगी | फासला...

Manoj Mittal
Jul 19, 20252 min read


The Shadow of my Existence
मेरे वज़ूद की परछाई कविता वह पुल है जो हृदय से हृदय तक जाता है, बिना किसी शोर के। कविता केवल शब्दों का खेल नहीं होती- यह एक गहन अनुभव...

Manoj Mittal
Jul 5, 20256 min read


श्वासों थमो जरा
जी वन निरंतर गति है — हर पल साँसों की लय में बंधा हुआ। पर क्या कभी हमने उस लय को विराम देने की इच्छा की है? यह कविता एक आत्मा की पुकार...

Manoj Mittal
Jun 18, 20252 min read


माटी का लोंदा
Click on video to listen. Sound starts at 6 seconds माटी का लोंदा था वो भर अंजुरी में स्नेह से अभिसिंचित कर नाज़ुक उंगलियों ने तराशा...

Manoj Mittal
May 30, 20252 min read


पर आज निकला है दिन
जेठ का अंधड़ है और उड़ता है भयावह बवंडर बेख्याली मे बेखबर बेसुध हूँ मैं जरूरी नहीं सूरज छुपने से रात हो ही खुद का खुद तक लौटना है जरूरी ...

Manoj Mittal
May 13, 20252 min read


हवा मुद्दतों में चली है वहाँ
हवा मुद्दतों में चली है वहाँ दिल के गोशे गोशे में मगर हलचल हुई है यहाँ | अमावस्या का घनेरा है वहाँ स्निग्ध चाँदनी सा स्नेहिल चेहरा मगर झाँकता है यहाँ | ग़ज़ल एक किसी ने कही है वहाँ दीदार-ए-ग़ज़ल की मगर ख्वाहिशें हैं यहाँ | दर्द-ए-सुर में डूबे हैं लफ़्ज़ वहाँ महफ़िल-ए-सुखन में मगर दादें बटोरतीं हैं नज़्मे यहाँ | धूप में बरसती तपिश बहुत है वहाँ पेशानी की सलवटों में मगर पसीने की बूंदें अटकी हैं यहाँ | हिज़्र की रातों में रोया है दिल वहाँ आशियाना-ए-इश्क मगर खाक हुआ है यहाँ |

Manoj Mittal
May 2, 20252 min read


लगता है यों कभी..
लगता है यों कभी ठिठक सी गई है ज़िंदगी तन्हा रास्तों पर मील के पत्थर सी शायद देना चाहती है दस्तक मन को उतर आई हो शाम- ज़िंदगी की पगडंडीयों...

Manoj Mittal
Apr 12, 20252 min read


क्यों है ?
खिला है दिन पर उजियारे में पसरा अंधेरा क्यों है ? लजाती हँसी में उदासी का ये सबब क्यों है ? ताज़ा खिला है गुलाब काँटों में लेकिन अटका...

Manoj Mittal
Apr 5, 20252 min read
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