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सोनगंगा का वो पुल

  • Writer: Manoj  Mittal
    Manoj Mittal
  • Dec 24, 2025
  • 17 min read

Updated: Dec 26, 2025

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देवखेड़ा उत्तरप्रदेश के रानीपुर जिले मे बुंदेलखंड क्षेत्र का एक बेहद पुराना और खूबसूरत गाँव है | यह विंध्य पर्वत श्रंखला के थोड़ा उत्तर में स्थित है | यह विंध्य का पठारी क्षेत्र है | देवखेड़ा वैसे तो लगभग मैदानी और समतल जमीन पर बसा है परंतु उसके दक्षिण और पश्चिम में घने जंगल और छोटी पहाड़ियाँ है | देवखेड़ा के पूर्व में यमुना की एक सहायक नदी सोनगंगा है, जो मलाना की ओर से आकर लगभग साठ किलोमीटर दूर किशनपुर कस्बे के पास यमुना मे विलीन हो जाती है | किशनपुर में गिरिजा देवी का एक ऐतिहासिक प्रसिद्ध मंदिर भी है | यहाँ लोग दूर दूर से दर्शन के लिए आते हैं | साल में एक बार कार्तिक की पूर्णिमा के दिन यहाँ दो दिनों का मेला लगता है | इसकी विशेषता है कि ये दिन और रात लगातार चलता है | देवखेड़ा के लोग भी बैलगाड़ी और टेम्पो में बैठकर हर साल यहाँ आते हैं | पूजा अर्चना , यमुना स्नान ,खाना-पीना, खरीदारी ,झूले ,हँसी-ठीठोली और खूब सारी मौजमस्ती | ये दो दिन पूरी मस्ती के होते हैं | लोग पूरे वर्ष इसकी प्रतीक्षा करते हैं , खासकर युवा और बालक |


सोनगंगा में वैसे तो हर समय काफी पानी रहता है परन्तु बरसात मे तो यह उफान पर होती है और कभी कभी देवखेड़ा मे बाढ़ की स्थिति भी बन जाती है | देवखेड़ा के पूर्व मे नदी पार सादोपुर नाम का एक कस्बा है | इन दोनों को जोड़ते हुए सोनगंगा नदी पर लकड़ी का एक पुराना पुल है | देवखेड़ा तो सोन गंगा के एकदम किनारे बसा है जबकि सादोपुर नदी पार करने के बाद लगभग एक किलोमीटर दूर है | देवखेड़ा के लोग सादोपुर जाने के लिए इसी पुल  का उपयोग करते हैं | पैदल भी जाओ तो ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा ही लगता है | इस पर मोटर वाहन चलाने पर रोक है | हाँ, लोग साइकिल जरूर चलाते हैं | देवखेड़ा पाँच सों लोगों का एक बहुत छोटा सा गाँव है और उसमे भी कई टोले हैं जैसे धोबी टोला ,कुम्हार टोला, रंगरेज टोला आदि | गाँव के अधिकतर रसूखदार लोग गाँव के पश्चिम में रहते हैं | मुखिया सेवाराम का घर भी वही है | घर के साथ लगे अहाते मे ही तीन गायें ,दो भैंस और  दो बैल बंधे रहते हैं | उनकी देखभाल के लिए कल्लू पंद्रह साल से यहाँ काम कर रहा है | कल्लू, सेवाराम का भरोसे का आदमी है | जानवरों को पानी पिलाने और नहलाने नदी तक भी ले जाता है , जंगल से लकड़ी और घाँस भी ले आता है और मुखियाजी के भी अन्य छोटे मोटे  काम कर देता है | कल्लू की पत्नी बिलासो और उसका दस वर्ष का लड़का राजू भी वहीं पास में मुखियाजी के घेर में बने एक कमरे में रहते हैं |


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हते हैं कि अंग्रेजों ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद 1860 के आसपास यहाँ अपनी एक फौजी टुकड़ी के लिए छावनी बनाई थी जिससे वो बुंदेलखंड के इस हिस्से पर नियंत्रण रख सकें | उस समय की एक दो इमारतें  आज भी यहाँ मौजूद हैं | गाँव की पंचायत का दफ्तर भी ऐसी ही एक बैरेकनुमा इमारत मे है | ये एक लंबी सी इमारत है, जिसकी ईंट की दीवारें कम से कम अठारह इंच मोटी हैं | छत पर ऐस्बेस्टस की चादरें लगीं हैं | रंगरोगन करने के बाद आज भी यह गाँव की सबसे सुंदर इमारत लगती है | अंग्रेजों के जाने के बाद धीरे धीरे यह एक गाँव के रूप में बस गया था | अंग्रेजों ने ही नदी पार करने के लिए सादोपुर की तरफ लकड़ी का ये सुन्दर पुल बनाया था | पुल की चौड़ाई लगभग तीन मीटर होगी और दोनों ओर पत्थरों के अबटमेंट्स हैं | यह साल की लकड़ी का मेहराबदार पुल है | सुरक्षा के लिए पुल के दोनो ओर लकड़ी की ही सुंदर रेलिंग लगी है और पुल की डैक स्लैब पर लकड़ी के तख्ते लगे हैं | पुल के ऊपर खड़े होकर शाम को सोनगंगा का बहता पानी, दक्षिण ओर पश्चिम में पहाड़ियाँ और हरे जंगल, नदी किनारे देवखेड़ा गाँव,पहाड़ियों पीछे छिपता सूरज और पुल की मेहराबों पर कतार से थके बैठे परिंदों को देखना एक कवि की कल्पना सा लगता है | सुबह सूर्योदय के समय सादोपुर की तरफ से उगते सूरज की किरणें  सोनगंगा के जल और पुल पर पड़ती तो सोनगंगा का जल सोने सा दमकता | गाँव वालों का मानना था कि सोनगंगा नदी का नाम इसलिए ही सोनगंगा पड़ा है |


अंबिका अक्सर सुबह और शाम यहाँ आकर घंटों बैठती थी और इस आलोकिक अनुभूति को शब्दों और लकीरों में उकेरने की कोशिश करती | शाम को तो अक्सर गाँव के कुछ बच्चे भी उसको घेर कर बैठे होते और साथ खेलने की मानमुरव्वत करते | अंबिका मुखिया सेवाराम की छोटी बेटी थी और बालकों मे बहुत लोकप्रिय थी | मुखिया जी का बेटा तो गाँव छोड़कर अब प्रयागराज मे एक फैक्ट्री में अकाउन्टन्ट की नौकरी करता है |उनकी पत्नी का देहांत पाँच वर्ष पूर्व तपेदिक की बीमारी से हो गया था | अंबिका ही अब मुखिया जी की सारी देखभाल करती थी | कल्लू का दस वर्ष का लड़का राजू तो उसको दीदी ही बोलता था और अंबिका भी उसे छोटा भाई ही मानती थी | अंबिका बाइस साल की इकहरे बदन की सलोनी सी और बेहद चंचल लड़की थी | उसने रानीपुर के कॉलेज से BA पास की थी | गाँव का हर व्यक्ति उसकी समझदारी का कायल था | पिछले दो वर्ष से वो सादोपुर के सरकारी प्राइमेरी स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्य कर रही थी |


प्ताह में छह दिन रोज सवेरे चार बजे उठकर घर के काम निबटाना ,नाश्ता और दोपहर का भोजन तैयार करना और फिर मुखिया जी को नाश्ता करा कर सवेरे नौ बजे तक स्कूल पहुँचना उसकी दिनचर्या मे शुमार था | गाँव के करीब बीस बच्चे भी उसी स्कूल मे पढ़ते थे | वो सभी अंबिका के साथ ही स्कूल जाते थे | सारे बच्चे सवेरे साढ़े आठ बजे तक पुल के पास एकत्र हो जाते और फिर अंबिका के साथ ही बातचीत करते हुए पैदल ही स्कूल तक जाते थे | लौटते समय भी सभी स्कूल के गेट पर एकत्र हो जाते थे | घर पहुचते पहुचते तीन तो बज ही जाते थे | कभी कभी अंबिका सादोपुर के बाज़ार से कुछ घर की खरीदारी भी कर लाती थी | उसका सारा समान बच्चे खुशी खुशी उठा ले आते थे | दोपहर का भोजन मुखिया जी अकेले ही करते थे | कल्लू की पत्नी बिलासो उनका भोजन गरम कर देती थी | जब सेवाराम भोजन करते तो अक्सर कल्लू का बेटा राजू भी उनके पास ही बैठ जाता था और उनसे बातचीत करता रहता था | मुखियाजी को भी यह अच्छा लगता था | अंबिका के स्कूल जाने के बाद मुखिया जी अपने खेतों का चक्कर लगाने चले  जाते थे और पंचायत का काम भी पंचायत घर जाकर कर आते थे | दोपहर बाद कोई न कोई मुखिया जी से मिलने घर आता रहता था | इसीलिए उन्होंने अपनी बैठक घर के एकदम बाहर वाले हिस्से में बना रखी थी | अंबिका शाम को गोधूलि के समय सोनगंगा किनारे बने पुल के पास जरूर जाती थी और वहाँ से सूर्यास्त का मनमोहक दृश्य अवश्य देखती | रात को भोजन और अन्य काम निबटाकर सोने से पहले अगले दिन स्कूल मे पढ़ाने की तैयारी करती और अपनी डायरी मे भी कुछ शब्द उकेरती | फिर कब उसकी आखें लग जातीं पता ही न चलता बस सवेरे घड़ी के अलार्म से नींद खुलती | छुट्टी के दिन वो सभी जानवरों की देखभाल कल्लू के साथ मिलकर करती | उसे काले रंग की गाय रंभा से बहुत लगाव था | वो घंटों उससे बात करती रहती और रंभा भी गर्दन हिलाकर उसकी बातों का जबाब देती रहती मानो उसे सब समझ आ रहा हो |


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पुल पार करने के बाद सादोपुर का रास्ता मुश्किल से एक किलोमीटर का होगा और उसमे से भी लगभग सौ मीटर का रास्ता कस्बे के बाज़ार से होकर गुज़रता था | वहीं बाज़ार से सटा हुआ लोक निर्माण विभाग का परिसर था जहाँ उनका सादोपुर उपखंड का दफ्तर भी था | सुनील गोस्वामी छह माह पहले ही अपनी पहली परिनियुक्ति पर सहायक अभियंता के पद पर आया था | वो मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले का रहने वाला था | सुनील सादोपुर मे ही एक किराये के मकान में रहता था | सुनील अपने ऑफिस की खिड़की से अंबिका और बच्चों को रोज आते और जाते देखता | उसका यह क्रम पिछले चार माह से चल रहा था | उसे बहुत कोतूहल होता कि यह चुलबुली सी लड़की कौन है | दिन पर दिन उसकी यह जिज्ञासा बढ़ती गई | उसने अपने ऑफिस में इस बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि  यह देवखेड़ा के मुखिया जी की बेटी अंबिका है | दरअसल सुनील के ऑफिस का जूनियर अकाउन्टन्ट कमल, देवखेड़ा का ही रहने वाला था | अंबिका का चुलबुलापन और सलोना रंग धीरे धीरे सुनील पर जादू करने लगा था | वो हरदम उसके ख्यालों में रहने लगी थी | जैसे ही अंबिका का आने या जाने का समय होता उसकी नज़रे सड़क की ओर  तकती रहतीं | हालांकि यह झलक केवल कुछ क्षणमात्र की ही होती | अपने काम के सिलसिले में वो मलाना और किशनपुर जा चुका था पर देवखेड़ा जाने का उसको अवसर नही मिला था जबकि देवखेड़ा उसके ऑफिस से बहुत नजदीक था | उसके मन में विचार आता कि देवखेड़ा कैसा होगा जहाँ अंबिका रहती है | ये सब सोच सोच कर सुनील मन में अपनी ही एक काल्पनिक दुनिया बसाता रहता |


पिछले पंद्रह दिनों से सुनील थोड़ा परेशान था | ऑफिस के काम में उसका मन नही लगता था | बार बार सड़क की और देखता पर अंबिका या साथ आने वाले बच्चे नजर ही नही आते थे | वो बहुत व्यथित और उद्गिन रहने लगा था | उससे जब नही रहा गया तो अपने अकाउन्टन्ट कमल को बुला कर संकोच से पूछा -

 “कमल ,ये जो देवखेड़ा की लड़की थी ना अंबिका और उसके साथ के बच्चे,वो आजकल नजर नही आते हैं | तुम्हें कुछ पता है क्या ? सब खैरियत तो है ना | “

कमल यह सुनकर थोड़ा चौक गया | उसने कहा -

 “ हाँ साहब वो आजकल स्कूल नही आ रहें हैं |”

“ क्यों “ सुनील ने तुरंत अगला प्रश्न किया |

कमल बोला-

“साहब गाँव में एक दुर्घटना हो गई थी और उसके बाद सादोपुर और देवखेड़ा को जोड़ने वाला पुल बंद कर दिया गया है |”

“कैसी दुर्घटना ? अंबिका तो ठीक है ना !” सुनील ने तुरंत वापस सवाल किया | सुनील अब थोड़ा परेशान लगने लगा था |


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साहब की ऐसी स्थिति देख कमल ने विस्तार से बताया-

“ साहब पंद्रह दिन पहले रोजाना की तरह अंबिका, सोनगंगा के किनारे शाम को पुल के पास बैठी थी | गाँव के काफी सारे बालक भी उसके साथ थे | सभी अंबिका से उनके साथ छुप्पन-छुप्पी खेलने की जिद कर रहे थे | उस दिन अंबिका का खेलने का मन नही था तो उसने बच्चों को अपने आप खेलने के लिए बोला और खुद नदी किनारे एक बड़े से गोल पत्थर पर बैठ सूरज को डूबते हुए देखने लगी | वो, अक्सर डूबते सूरज की लालिमा मे , सोनगंगा के कल कल करते पानी मे और पहाड़ियों के ढलानों मे अपना खोया बचपन और भविष्य के सपने ढूंढती रहती है | उस दिन भी अंबिका अपने इन्ही ख्यालों में डूबी थी तभी उसे अचानक बच्चों की चीख-पुकार सुनाई दी | एक दस साल का लड़का राजू पुल पर खेलते हुए नदी में गिर गया था | दरअसल उसकी आँखों पर पट्टी बंधी थी और वो अन्य बच्चों को दूँढ़ रहा था | शायद पुल की डेक का कोई लकड़ी का तख्ता कमज़ोर हो गया था और राजू उसके टूटते ही वहीं से नीचे गिर गया | नवंबर के महीने में रात भी जल्दी हो जाती है और पानी भी ठंडा होता है | शोर सुन गाँव के अनेकों लोग नदी पास दौड़ आए | हरिया ने तुरंत नदी में छलांग लगा दी | हरिया एक अच्छा तैराक था | उसके साथ ही दो और लोग भी नदी में उतर गए | अंबिका का तो रो रो कर बुरा हाल था | उसको लग रहा था कि ये सब उसकी वजह से हुआ है | कल्लू और उसकी पत्नी बिलासो तो सकते मे थे | मुखिया जी भी वहाँ पहुँच गए थे | सभी अंबिका, कल्लू ओर बिलासो को ढाढ़स बंधा रहे थे | आधा घंटे की मसक्कत के बाद हरिया, राजू को किनारे ला पाने में सफल रहा | प्राथमिक उपचार के बाद उसको मलाना के अस्पताल में भर्ती किया गया | तीन दिनों बाद उसको छुट्टी दे दी गई थी | अब राजू ठीक है | अंबिका, कल्लू ,बिलासो , मुखिया जी और गाँव के बालक सभी सदमे मे हैं |"


“अरे इतना कुछ हो गया और मुझे कुछ पता ही न चला | पुल को बंद क्यों कर दिया? क्या कोई और रास्ता नही है सादोपुर आने का? देवखेड़ा के लोग अब सादोपुर कैसे आते हैं ? उनका तो मुख्य बाज़ार भी यही है | बच्चे स्कूल कैसे आयेगें ? ” सुनील ने इतने सारे प्रश्न कमल की ओर दाग दिए |


कमल बोला - “साहब आजकल देवखेड़ा से बहुत कम लोग ही सादोपुर आ पा रहे हैं | दूसरा रास्ता मलाना होकर है | देवखेड़ा से पश्चिम की ओर पहाड़ियों से होकर एक संकरी सड़क है जो टेम्पो से मलाना तक पहुचने में डेढ़ घंटा लेती है और फिर वहाँ सोनगंगा पर बडा पक्का पुल है उसे पार कर सादोपुर तक आने में एक घंटा और | कुल मिलाकर टेम्पो और बस से दो घंटे लग  जाते हैं | ये बहुत उल्टा और महंगा पड़ता है | रोज रोज देवखेड़ा के लोग इस तरह नही आ सकते हैं | कभी कभार की बात अलग है | सोनगंगा मे भी हमेशा पानी रहता है , बहाव बहुत तेज है, पानी भी उथला है और तली भी बहुत पथरीली है | ना तो नाव चल सकती है और ना ही पैदल पार कर सकते हैं | मैं भी आज कल यहीं सादोपुर मे अपने एक दोस्त के घर रह रहा हूँ | अंबिका और बच्चों के लिए तो यह संभव ही नही है | “


“अरे ये तो बड़ी परेशानी वाली बात है | पुल को किसने और क्यों बंद कर दिया ? ” सुनील ने पूछा |


कमल ने बताया की हादसे के बाद डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रैट के आदेश पर लोक निर्माण विभाग मलाना उपखंड के सहायक अभियंता ने पुल का निरीक्षण करके रिपोर्ट में पुल को असुरक्षित पाया और इसके ठीक होने तक इसको बंद करने के आदेश दे दिए | मुखिया जी ने जब यह जानना चाहा कि ये कब तक ठीक हो पाएगा तो उन्होंने बताया कि अभी तो फंड नही हैं जैसे ही फंड आएंगे इसका टेन्डर कर दिया जाएगा | कमल ने यह भी बताया कि मुखिया जी विधायक रामलखन से भी मिल चुके हैं परंतु कोई परिणाम नही निकला | कोई गाँव वालों की समस्या को ठीक से समझ ही नही पा रहा है | सारी बात समझने के बाद सुनील ने कहा कि वो मलाना उपखंड के सहायक अभियंता से बात कर समाधान निकालने का प्रयत्न करेगा | यह सुन कमल को भी थोड़ी राहत मिली |


दो दिन बाद कमल ने ही सुनील के पास जाकर पूछा -

 “साहब आपकी बात हुई क्या ? गाँव के लोगों और मुखिया जी ने तो पुल को ठीक करने के लिए आपस में ही पैसे एकत्र करना शुरू कर दिया है | मुखियाजी ने तो अपने कुछ खेत और जानवर भी बेचने का फैसला लिया है | अंबिका अपनी गाय रंभा को बेचने के लिए बिल्कुल तैयार नही है पर शायद उसे यह भी करना पड़े | मुखिया जी पुल को किसी भी कीमत पर जल्दी ठीक करना चाहते हैं | पुल बंद होने से गाँव की धड़कन ओर ज़िंदगी जैसे थम सी गई है | किसी को नही पता क्या करें | क्या आप एक बार पुल का निरीक्षण कर सकतें हैं ? आप भी तो इतने बड़े इंजीनियर हैं |”

सुनील ने बताया -

 “हाँ, मेरी बात हुई थी | उन्होंने कोई विस्तृत रिपोर्ट नही बनाई है |बस सुरक्षा कारणों से इसको बंद कर दिया है | लगता है यह कार्य अभी उनकी प्राथमिकता में नहीं है |लेकिन मैं गैर-अधिकारिक तौर पर इसका निरीक्षण कर

लूँगा | “ यह जान कमल को बहुत अच्छा लगा |


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दो दिन बाद रविवार को छुट्टी के दिन सुनील ने वहाँ जाने का निर्णय लिया | कमल ने मुखिया जी को भी इसकी जानकारी दे दी थी | कमल भी सुनील के साथ गया | दोनों सरकारी जीप से पुल तक पहुंचे | मुखिया जी और अंबिका भी वहाँ थे | अंबिका का उतरा  हुआ चेहरा देख उसे बहुत दु:ख हुआ | उसकी आँखे सूजी हुई थीं और बाल उलझे हुए | अंबिका की चंचलता न जाने कहाँ गुम हो गई थी | सुनील को लगा जैसे पुल मे ही उसकी जान बसती है | अंबिका तो उसको जानती भी नही थी | अंबिका को कहाँ पता था कि सुनील पिछले चार महीने से उसी के बारे में सोचता रहता है | सुनील पढ़ाई में हमेशा से बहुत तेज था | इस सरकारी नौकरी से पहले उसने दो साल एक पुल की निर्माण कंपनी में भी काम किया था | पुल का निरक्षण करने के बाद उसने पाया की पुल की हालत ठीक है केवल डेक स्लैब को ही मरम्मत की जरूरत है और इसके डेक को ठीक करने में ज्यादा समय भी नही लगेगा | इसकी महराबे और अबटमेंट्स सब लगभग ठीक हैं | कहीं कहीं थोड़ा मरम्मत की जरूरत है | उसने अंदाज लगाया की इसको ठीक करने में ज्यादा से ज्यादा पंद्रह दिन लगेंगें और लगभग दस लाख रुपए का खर्च आएगा | यह जानकार मुखिया जी बोले ये धनराशि हम गाँव वाले इकठ्ठा कर लेंगें आप इसको मरम्मत करा दो | सुनील ने मुखियाजी से डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रैट और मुख्य अभियंता रानीपुर से मिलने की सलाह दी | उसने यह भी भरोसा दिलाया की इस बारे में वो खुद भी मुख्य अभियंता से बात करेगा क्योंकि यह सरकारी काम उनकी सहमति के बिना नही हो सकता है और सरकारी कार्य करने की अपनी एक तय प्रक्रिया होती है | यह सुन अंबिका की आँखों में उम्मीद की एक चमक सी आ गई | लौटते समय सुनील ने महसूस किया कि अंबिका की आखें नम हो आयीं थीं  और वो खुद भी कहाँ अपने आँसू रोक पा रहा था |


मय लेकर सुनील अपने मुख्य अभियंता रवि वर्मा जी से रानीपुर में मिला और सारी घटना की जानकारी दी | उसने पुल के बारे में अपनी राय भी बताई | गाँव वालों की परेशानियों के बारे में भी बताया विशेषकर अंबिका और बच्चों की |वर्मा जी ने बताया कि गाँव के मुखिया सेवाराम भी उनसे मिल चुके हैं | रवि वर्मा जी ने यह कार्य सुनील को हस्तांतरित कर दिया और दस लाख रुपये आबंटित करने का भरोसा दिलाया | उन्होंने सुनील से जल्दी कागजी कार्यवाही कर बिना टेन्डर ही विभागीय स्तर पर इस कार्य को करने का आदेश दिया | सुनील ने सादोपुर लौटकर पुल की निरीक्षण रिपोर्ट , मरम्मत की तकनीकी योजना और अनुमानित लागत का ब्योरा तैयार कर अपने अधिशाशी अभियंता को अनुमोदन के लिए भेज दिया | उसके पश्चात सुनील ने ने दिन रात लगकर पुल की मरम्मत का कार्य ,कार्ययोजना के अनुसार लगभग एक माह में दस लाख रुपए की अनुमानित राशि मे पूरा करवाया |सुनील तो इस कार्य को अपना व्यक्तिगत कार्य समझ बहुत शिद्दत से करवा रहा था | गाँव के लोगों ने भी इसमे पुरी तरह से सहयोग किया | एक बार मुख्य अभियंता रवि वर्मा ने भी आकर निरीक्षण किया |मुखिया जी दिन में तीन बार पुल का चक्कर लगाते और कारीगरों का हौसला बढ़ाते | अंबिका तो लगभग सारा दिन वहाँ रहती | मुखिया जी की हिदायत पर सुनील के लिए अक्सर दोपहर का भोजन वो खुद घर से लाती | अधिकांश समय बालकों के साथ, पास ही इमली के पेड़ के नीचे बैठ कुछ लिखती रहती | सुनील का मन होता कि वो उसके पास जाकर बैठे और बात करे, पर उसकी हिम्मत न होती | इन बीस दिनों में अंबिका सुनील के दिल में पूरी तरह समा चुकी थी | सुनील भी सूर्यास्त के बाद ही घर लौटता था | वह भी यह महसूस कर चुका था कि सूर्यास्त के समय पुल से सोनगंगा , देवखेड़ा और पहाड़ियों के ढलान के दृश्य उसके मन मे भी एक हूक सी जगाते हैं और रात को सोने भी नही देते हैं |


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कार्तिक माह की पूर्णिमा से दो दिन पहले सोनगंगा पुल को फिर से खोलने का निर्णय लिया गया | सुनील ने गाँव के सभी निवासियों , मुखिया जी, अपने अधिकारियों और मुख्य अभियंता रवि वर्मा जी को निमंत्रित किया | उस दिन पुल को सुंदर फूलों से सजाया गया | देवखेड़ा से पुल तक के रास्ते को रंगबिरंगी झंडियों से पाट दिया गया | पंडित जी पूजा अर्चना के लिए तैयार थे | सवेरे के दस बजे थे | खूबसूरत धूप खिली हुई थी | लोग सुन्दर कपड़े पहन सज-सँवर के आ रहे थे | हँसी खुशी और उत्सव का माहौल था | मुखियाजी भी सफेद कुर्ता पायजामा और बंद गले का काला कोट पहन कर आए थे | उनके साथ उनकी उंगली पकड़े राजू भी था | कल्लू, बिलासो , हरिया ,कमल, रमन सभी आ गए थे | थोड़ी देर में रवि वर्मा जी भी कुछ और अधिकारियों के साथ आ गए | मुखिया जी, सुनील और गाँव वालों ने उनका स्वागत किया और आभार व्यक्त किया | इस सबके बीच सुनील की नजरें अंबिका को दूँढ़ रहीं थीं  परंतु वो उसको वहाँ नजर नही आ रही थी | उसने कमल से पूछा तो पता चला कि आज उसने व्रत रखा है और वो गाँव के मंदिर में पूजा करने गई है | कुछ देर और प्रतीक्षा के बाद उसने मुखिया जी और रवि वर्मा जी को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया | पंडित जी ने भी शंखनाद किया |


रवि वर्मा जी ने गाँव वालों को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हे बेहद खुशी है कि यह पुल मरम्मत के बाद अब तैयार हो

गया है | यह आप सब की और सुनील की मेहनत का परिणाम है | उन्होंने यह भी कहा कि मैँ जानता हूँ यहाँ एक शख्स ऐसा भी है जिसकी नज़रों में यह पुल केवल दो गॉवों को जोड़ने का एक जरिया ही नही बल्कि गाँव वालों की आकांक्षाओं और सपनों की उड़ानों का सेतु भी है | वह शख्स कोई और नही बल्कि मुखियाजी की बेटी अंबिका है | में चाहता हूँ की इसका उद्घाटन हमारे साथ अंबिका भी करे | यह सुन सब आचंभित रह गए और नजर अंबिका को दूँढ़ने

लगीं | अंबिका मंदिर से आकर कब पीछे खड़ी हो गई , किसी को पता ही न चला | आज वो बेहद खुश थी | उसने चटक रंगों की पल्लूदार साड़ी पहन रखी थी | सलोने चेहरे पर खुले बाल कयामत ढ़ा रहे थे | सुनील ने महसूस किया कि उसके लहजे में पहले की तरह चुलबुलापन है, मानो उसकी ज़िंदगी लौट आयी हो | कल्लू और कमल तुरंत दौड़कर उसको आगे ले आए | उसने रवि वर्मा जी को अभिवादन किया | रवि वर्मा जी, मुखिया जी और अंबिका ने पूजा अर्चना के साथ सोनगंगा पुल का विधिवत उद्घाटन किया | गाँव वालों की खुशी का तो ठिकाना ही ना था | अब बच्चे स्कूल जा सकते थे | कमल भी गाँव लौट सकता था | सबके सपने उमंगों की डोर थाम , पुल पार कर पा रहे थे | देवखेड़ा के लोगों ने ऐसा खुशी का मंज़र शायद ही पहले कभी देखा था | कल्लू और बिलासो राजू को देख रहे थे | राजू का हाथ मुखियाजी ने थाम रखा था | धीरे धीरे सब घर लौटने लगे थे |


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प्रत्याशित रूप से अचानक अंबिका ने सुनील के पास आकर कहा -

“आइये पुल से सोनगंगा को पार करते हैं |”

“हाँ बिल्कुल “ सुनील ने सकपकाते हुए कहा | धीमे धीमें कदमों से दोनों पुल पर देवखेड़ा से सादोपुर की और चलने लगे | धूप बहुत भली लग रही थी | हवा भी मंद मंद चल रही थी और अंबिका को अपना पल्लू बार बार ठीक करना पड  रहा था | अंबिका की आखें सुनील को शुक्रिया कहने की कोशिश कर रहीं थीं | सुनील भी उसके इस भाव को समझ रहा था | सच तो यही था कि ये सब उसने अंबिका के लिए ही किया था | पुल के बीच पहुँच अंबिका ने कहा -

“मैं यहाँ रोज सूर्यास्त के समय सुरमई शाम देखने आती हूँ | सुरमई शाम मेरे दिल मे जीवन के रंग भर देती है और मैँ उन्हे अपनी डायरी मे |लगता है जैसे मुझे आज एक नयी ज़िंदगी मिली है |परसों कार्तिक की पूर्णिमा है | किशनपुर मे गिरिजा मंदिर के पास सालाना मेला है | आप साथ चलेंगे क्या ? मेरा बहुत मन है | अच्छा लगेगा |”

ये शब्द सुनील की धड़कन तेज कर रहे थे |यह सुन सुनील ने अंबिका का हाथ अपने हाथ में पकड़ एकदम हाँ कर दी | उसको लगा मानो सारी कायनात सोनगंगा के इस पुल पर उनके चारों ओर सिमट आयी है | अचानक हवा तेज हो गई थीऔर बादल का एक मासूम टुकड़ा सूरज के साथ आँख मिचौली खेल रहा था | सोनगंगा के चंचल जल में धूप छाँव का ये मोहक दृश्य दोनों के ह्रदयों को स्पंदित करने लगा था |उसने अंबिका के हाथों पर अपना दबाब थोड़ा और बढ़ा दिया था | दोनों एक दूसरे का हाथ थामे लौट चले थे |



मनोज मित्तल - 25 दिसम्बर 2025 | नोएडा

Proof Check- Bharti

Images are AI generated


Disclaimer: All characters, places and incidents in this story are fictious.



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Devkheda is a historic and scenic village in the Ranipur district of Uttar Pradesh, situated near the Vindhya mountain range. The Songanga River flows past the village before joining the Yamuna near Kishanpur. There is a temple at Kishanpur. Each year, on the auspicious day of Kartik Purnima, there is a lively fair where people gather for worship, ritual bathing, and joyful celebrations.

The village head, Sewaram, resides with his daughter Ambika—a gentle, charming young woman who teaches at a school in Sadopur. Every morning, she travels with the village children, and her warmth has endeared her to everyone in Devkheda. An old wooden arch bridge spans the Songanga, linking Devkheda to Sadopur. Sunil, an assistant engineer with the PWD office in Sadopur, has quietly admired Ambika for some time, drawn to her grace and kindness.

One day, while playing near the river with Ambika, a child slips and falls into the water, causing panic throughout the village. Although the child is rescued, the incident highlights the deteriorating condition of the old bridge. Authorities declare it unsafe and close it, cutting off the villagers’ access to Sadopur. Moved by Ambika’s distress and the villagers’ hardship, Sunil steps forward. Using his technical expertise, he takes charge of repairing the bridge, working tirelessly to restore the connection between the two communities. When the bridge is finally completed, it is Ambika who inaugurates it along with others amid cheers and heartfelt gratitude from the villagers. The moment becomes a symbol of hope and renewal. As the Kartik Purnima fair approaches, Ambika invites Sunil to accompany her—marking not just the reopening of the bridge, but the beginning of a new chapter in both their lives.


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